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Who is truly responsible for student suicides?
रायपुर। आईआईटी मुंबई में एक छात्र की आत्महत्या ने फिर से कई पुराने सवाल खड़े कर दिये हैं लेकिन हम हैं कि असल मुद्दे छोड़कर लेकर पीटने में मशगूल हैं। जैसे नीट पेपर लीक में मंत्री के इस्तीफे को सारी समस्या का इलाज समझ लिया गया था वैसे ही इस प्रकरण में प्रोफेसर के इस्तीफे की माँग की जा रही है। एससी/एसटी एक्ट के अतार्किक लेकिन डरावने प्रावधानों के तहत प्रोफेसर के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कर दी गयी है। समर्थन और विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं और सोशल मीडिया भी अच्छी बुरी प्रतिक्रियाओं से सराबोर है। गम्भीर सामाजिक समस्या को राजनीतिक रंग देकर भीड़तंत्र के हवाले कर देना आज के दौर में एक परम्परा हो गया है। यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम बार बार असल समस्या को नजरअंदाज करके शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर छिपाये हुये हैं।
"ऑन परपज" नाम का पॉडकास्ट चलाने वाले विश्वप्रसिद्ध मोटिवेशनल स्पीकर जय शेट्टी अपनी बेस्टसेलर किताब "थिंक लाइक अ मॉन्क" में लिखते हैं कि आम तौर पर बच्चों को दो तरह के झूठ सुनना पड़ता है। या तो यह कि; "तुम जीवन में कुछ नहीं बन सकते" या फिर यह कि; "तुम जीवन में जो चाहो बन सकते हो"। जबकि वास्तविकता यह है कि कोई भी वह नहीं बन सकता जो वो चाहता है लेकिन वह जरूर बन सकता है जो वो है। ये झूठ भारतीय समाज के अधिकांश परिवारों पर पूरी तरह फिट बैठते हैं और अक्सर बच्चों से उनकी क्षमता से बहुत ज्यादा उम्मीद की जाती है। उपभोक्तावाद से ग्रस्त समाज में यह समझा जाता है कि महंगी कोचिंग के दम पर बच्चा "जो चाहे वह" बन सकता है। इस त्रासदी का एक दुखद पहलू यह भी है कि विरले मातापिता ही बच्चों को नैतिकता, नागरिक जिम्मेदारी, समाजसेवा, देशप्रेम तथा परोपकार की शिक्षा देते हैं। अधिकांश मातापिता की महत्वाकांक्षा बच्चे के आईआईटी अथवा मेडीकल कॉलेज में दाखिले की होती है क्योंकि इन दो व्यवसायों से प्रतिष्ठा और पैसा दोनों ही हासिल होते हैं।
भारतीय सिस्टम में करियर चुनाव के लिये कोई स्थापित प्रक्रिया नहीं है इसलिये अक्सर मातापिता की महत्वाकांक्षा और समाज की तत्कालीन अपेक्षा ही करियर निर्धारित करती है। जबकि वास्तव में किसी भी बच्चे का करियर तीन बुनियादी प्रश्नों से तय किया जाना चाहिये। पहला; वह क्या बनना चाहता है, दूसरा; वह क्या बन सकता है और तीसरा; वह क्या बनने के काबिल है? चूंकि हमारे समाज बच्चों में मौलिक सोच विकसित होने की गुंजाइश कम होती है इसलिए वह आसानी से बाहरी दुनिया से प्रभावित हो जाता है। नतीजा यह कि अक्सर पहले प्रश्न के पीछे साथियों का सोच और तत्कालीन सामाजिक धारा का प्रभाव होता है और दूसरे प्रश्न के पीछे माता पिता की महत्वाकांक्षा। तीसरे प्रश्न का उत्तर किसी भी बच्चे के व्यक्तित्व की बनावट और उसकी बौद्धिक क्षमता में मौजूद होता है लेकिन इन दोनों का सही आकलन न होने से सामाजिक दबाव और माता पिता की महत्वाकांक्षा ही ज्यादा असरदार साबित होते हैं। इसीलिये अधिकांश मातापिता द्वारा बच्चों को उनकी इच्छा के विपरीत और क्षमता के बाहर की पढ़ाई करने का दबाव डाला जाता है। और यह समस्या तब और भी गम्भीर हो जाती है जब बच्चों को महंगी कोचिंग क्लास में भेजा जाता है। पहले दसवीं कक्षा के बाद कोचिंग का फैशन था लेकिन भीषण प्रतिस्पर्धा के चलते अब कई कोचिंग संस्थान आठवीं कक्षा के बाद ही नीट या जेईई की तैयारी शुरू करवा देते हैं। इस कोचिंग कोर्स का लाखों खर्च के कारण मातापिता बच्चों को बीच बीच में याद दिलाते रहते हैं कि उन्हें हर हाल में सफल होना है। मातापिता भले ही इसे प्रेरणा समझें लेकिन यह बच्चों को और अधिक तनाव में डाल देता है।
इसी का नतीजा है कि देश भर के नामी इंजीनियरिंग और मेडीकल संस्थानों में दाखिले के बावजूद बच्चे दबाव और तनाव में रहते हैं। कोचिंग के गलाकाट प्रतिस्पर्धा भरे माहौल में सालों साल कोशिश करते रहने के परिणामस्वरूप ऐसे कई छात्रों की मानसिक स्थिति बेहद नाजुक और कमजोर हो जाती है और नामी संस्थानों में पढ़ाई का दबाव उन्हें निराशा और अवसाद में धकेल देता है। नतीजा यह कि आत्महत्या की घटनाएं निरन्तर जारी हैं। लेकिन हम हैं कि समस्या को अजीबोगरीब रंग देकर अगली दुर्घटना का इंतज़ार करने लगते हैं। इस लीपापोती के मूल में यह भय है कि असलियत सामने आते ही उसे स्वीकार करना मुश्किल होगा। और असलियत यही है कि इन आत्महत्याओं के वास्तविक जिम्मेदार महत्वाकांक्षी मातापिता और दिग्भ्रमित समाज हैं। हर आत्महत्या पर किसी को बलि का बकरा बना देने से आत्महत्याएं नहीं रुकेंगी। शिक्षाशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों और योजनाकारों को पूरी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करना पड़ेगा तब हम आत्महत्याएं रोक पायेंगे।