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bastar villages hoist tricolour first time after three decades
बस्तर। कभी माओवादी हिंसा और खौफ के साए में रहने वाले बस्तर संभाग के अंदरूनी गांवों में इस बार स्वतंत्रता दिवस का नजारा पूरी तरह बदला हुआ दिखाई दिया। लगभग तीन दशकों के लंबे इंतजार के बाद अबूझमाड़ से लेकर बीजापुर और सुकमा के दूरस्थ इलाकों तक कई गांवों में पहली बार शान से तिरंगा फहराया गया और राष्ट्रगान की गूंज सुनाई दी। ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि बदलते बस्तर और लौटती शांति का प्रतीक बन गया।
समाचार रिपोर्ट के मुताबिक, बस्तर संभाग के 90 से अधिक गांवों में पहली बार स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। इनमें बीजापुर के 33, सुकमा के 50 और नारायणपुर के 9 गांव शामिल हैं। यानी कुल 92 गांवों में इस बार पहली बार स्वतंत्रता दिवस का आयोजन हुआ।
कभी राष्ट्रीय पर्व मनाने पर था प्रतिबंध
बस्तर के इन इलाकों में लंबे समय तक माओवादी संगठनों का प्रभाव रहा। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर ग्रामीणों को सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित नहीं करने की चेतावनी दी जाती थी। कई गांवों में राष्ट्रीय ध्वज के बजाय लाल या काले झंडे दिखाई देते थे।
समय के साथ सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ी, नए सुरक्षा कैंप स्थापित हुए और माओवादी प्रभाव वाले इलाकों में प्रशासन की पहुंच मजबूत हुई। इसके बाद ग्रामीणों के बीच राष्ट्रीय पर्वों को लेकर भय का माहौल धीरे-धीरे खत्म हुआ। इस साल पहली बार इन गांवों के लोगों ने स्वतंत्रता दिवस खुले तौर पर मनाया।
अबूझमाड़ के गांवों में दिखी खुशी
अबूझमाड़ के बोतर, गुंडेकोट जैसे दुर्गम गांवों में भी तिरंगा लहराया गया। ग्रामीणों, महिलाओं और बच्चों ने उत्साह के साथ राष्ट्रीय ध्वज के नीचे कार्यक्रम में हिस्सा लिया। गांवों में प्रभात फेरी निकाली गई और राष्ट्रगान के साथ स्वतंत्रता दिवस समारोह आयोजित किए गए।
अड़मामाई क्षेत्र के कोरसकोड़ों, हचेकोटी, आदनार, बोतर, कुमनार, दिबालूर, गुंडेकोट, रेकापाल और रासमेटा जैसे गांवों में भी पहली बार तिरंगा फहराए जाने से ग्रामीणों के चेहरों पर खुशी और गर्व दिखाई दिया।
नारायणपुर से 120 किलोमीटर दूर गांव तक पहुंचा उत्सव
अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, नारायणपुर जिला मुख्यालय से करीब 120 किलोमीटर दूर स्थित बोतर गांव तक पहुंचना आज भी आसान नहीं है। इसी तरह ओरछा विकासखंड मुख्यालय से लगभग 55 किलोमीटर दूर इस गांव तक पहुंचने के लिए दुर्गम रास्तों से गुजरना पड़ता है।
बरसात के मौसम में रास्तों की स्थिति और कठिन हो जाती है। नदी-नालों और पहाड़ी इलाकों के बीच बसे इन गांवों तक सामान्य वाहन से पहुंचना चुनौतीपूर्ण है। इसके बावजूद इस बार राष्ट्रीय पर्व का उत्साह इन दुर्गम इलाकों तक पहुंचा।
सुरक्षा कैंपों के बाद बदली तस्वीर
बस्तर में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने और नए कैंप स्थापित होने के बाद कई दूरस्थ गांवों में प्रशासन और सुरक्षा बलों की पहुंच बढ़ी है। पिछले वर्षों में जिन इलाकों में राष्ट्रीय पर्वों के आयोजन को लेकर डर का माहौल रहता था, वहां अब ग्रामीण स्वयं तिरंगे के साथ नजर आ रहे हैं।
2025 में भी बस्तर के कई दूरस्थ गांवों में पहली बार स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। इस साल यह दायरा और बढ़ा है। अधिकारियों के अनुसार, राष्ट्रीय पर्वों के आयोजन के साथ-साथ सुरक्षा कैंप विकास और जनसंपर्क गतिविधियों में भी भूमिका निभा रहे हैं।
31 मार्च के बाद पहला बड़ा बदलाव
बस्तर में माओवादी हिंसा के खिलाफ अभियान में 31 मार्च 2026 को एक महत्वपूर्ण पड़ाव आया। इसके बाद सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने बस्तर के माओवादी प्रभाव वाले इलाकों में शांति और प्रशासन की पहुंच बढ़ने पर जोर दिया। इसी पृष्ठभूमि में इस स्वतंत्रता दिवस को कई गांवों के लिए ऐतिहासिक माना गया।
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने भी कहा था कि इस बार बस्तर में ऐसा कोई गांव नहीं होगा, जहां तिरंगा नहीं फहराया जाएगा और भारत का संविधान लागू नहीं होगा। उन्होंने बीजापुर के 33, सुकमा के 50 और नारायणपुर के 9 गांवों में पहली बार ध्वजारोहण की जानकारी दी थी।
बच्चों और ग्रामीणों में दिखा खास उत्साह
इन गांवों में स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रमों में बच्चों की भागीदारी सबसे खास रही। हाथों में छोटे-छोटे तिरंगे लेकर बच्चों ने प्रभात फेरी निकाली। महिलाओं और ग्रामीणों ने भी उत्साह के साथ समारोह में हिस्सा लिया।
जहां कभी राष्ट्रीय पर्व के दिन डर और सन्नाटा देखने को मिलता था, वहां इस बार राष्ट्रगान, तिरंगे और देशभक्ति के नारों की गूंज सुनाई दी। यही बदलाव बस्तर में बदलते सुरक्षा माहौल की सबसे बड़ी तस्वीर के तौर पर सामने आया।
'कुख्यात' से 'विख्यात' बनाने की कोशिश
सरकार की ओर से बस्तर के उन इलाकों को, जो लंबे समय तक माओवादी हिंसा के कारण देशभर में चर्चा में रहे, अब विकास और मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। दूरस्थ गांवों में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और रोजगार जैसी सुविधाओं की पहुंच बढ़ाने को भी इस बदलाव का अहम हिस्सा माना जा रहा है। सरकारी प्रकाशन में भी बताया गया है कि बुनियादी ढांचे के विस्तार से दूरस्थ इलाकों में शासन की पहुंच बढ़ी है।
इस बार का स्वतंत्रता दिवस इसलिए भी खास रहा क्योंकि तिरंगा केवल शहरों और जिला मुख्यालयों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन गांवों तक पहुंचा जहां कभी राष्ट्रीय पर्व मनाना भी मुश्किल माना जाता था।
बस्तर के इन गांवों में तिरंगे का फहराना सिर्फ एक ध्वजारोहण नहीं, बल्कि भय से विश्वास, हिंसा से शांति और अलगाव से लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ते बदलाव की तस्वीर के रूप में देखा जा रहा है।