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ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर का भारतीय राजनीति के सबसे बड़े कुनबे- नेहरू-गांधी परिवार से एक ऐसा अनचाहा और दर्दनाक रिश्ता रहा है, जिसे इतिहास कभी नहीं भूल सकता। इतिहास के झरोखे से देखें तो इस परिवार की तीन पीढ़ियों की अंतिम कड़वी यादें इसी शहर से जुड़ी हुई हैं। चाहे वह पंडित जवाहरलाल नेहरू हों, इंदिरा गांधी हों या फिर राजीव गांधी, तीनों की जिंदगी के आखिरी पड़ाव का गवाह भुवनेश्वर ही बना।
तीन राष्ट्रीय दिग्गजों का जमावड़ा और राजीव का वो आखिरी आत्मविश्वास
मई 1991 का महीना था और देश में लोकसभा चुनाव की सरगर्मियां चरम पर थीं। 20 मई को भुवनेश्वर देश की सियासत का केंद्र बना हुआ था, क्योंकि उस दिन देश के तीन बड़े नेता- कार्यवाहक प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी और कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी चुनावी रैलियों के लिए इसी शहर में डेरा डाले हुए थे। चंद्रशेखर जहां राजभवन में रुके थे, वहीं जोशी और राजीव गांधी को वीआईपी गेस्ट हाउस में ठहराया गया था।
अगली सुबह यानी 21 मई को राजीव गांधी के चेहरे पर गजब का उत्साह और जीत का भरोसा था। पत्रकारों से मुखातिब होते हुए उन्होंने पंजाब और अयोध्या जैसे सुलगते मुद्दों पर बेहद बेबाकी से कहा था “बस कुछ ही दिनों का इंतजार और है। हम सत्ता में वापसी कर रहे हैं और सरकार गठित होते ही इन तमाम समस्याओं को सुलझा लिया जाएगा।”
खुद विमान उड़ाकर विशाखापट्टनम और फिर... वो खौफनाक रात
प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म करने के बाद राजीव गांधी उसी निजी विमान से विशाखापट्टनम के लिए उड़ गए, जिसे वह एक दिन पहले खुद पायलट की सीट पर बैठकर दिल्ली से लाए थे। आंध्र प्रदेश में रैलियां करने के बाद वह शाम को तमिलनाडु के चेन्नई (तब मद्रास) पहुंचे।
रात के सन्नाटे को चीरती हुई जब एक फोन कॉल आई, तो उसने पूरे देश को सुन्न कर दिया। खबर आई कि मद्रास के पास एक आत्मघाती बम धमाके में राजीव गांधी की जान चली गई है।
उस दौर में भुवनेश्वर में मौजूद टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार लव कुमार मिश्र के लिए वह रात किसी भयानक सपने जैसी थी। खबर मिलते ही वह आनन-फानन में जैसे थे, वैसे ही (लुंगी पहने हुए) घर के पास स्थित दफ्तर की तरफ दौड़े। दफ्तर के कर्मचारी को जगाकर टेलीप्रिंटर रूम खुलवाया गया। टेलेक्स मशीन पर उंगलियां थिरकने लगीं और पूरे दिन की पल-पल की रिपोर्ट टाइप होने लगी।
उसी वक्त पत्रकार के जेहन में अतीत की दो और खौफनाक तस्वीरें कौंध गईं।
इंदिरा गांधी (1984): 30 अक्टूबर को भुवनेश्वर में ही इंदिरा गांधी ने अपना वह ऐतिहासिक और भावुक भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके खून की एक-एक बूंद देश के काम आएगी। इसके ठीक दो दिन बाद दिल्ली में उनकी हत्या कर दी गई।
जवाहरलाल नेहरू (1964): जनवरी 1964 में भुवनेश्वर के कांग्रेस अधिवेशन के दौरान पंडित नेहरू को दिल का दौरा पड़ा था। वह इस झटके से पूरी तरह उबर नहीं पाए और उसी साल 27 मई को उनका निधन हो गया।
राजीव गांधी ने भी अपनी जिंदगी का आखिरी सवेरा भुवनेश्वर की धरती पर ही देखा था। अगले दिन देश के प्रतिष्ठित अखबार 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' के सभी एडिशनों में पहले पन्ने पर लव कुमार मिश्र की एक ऐसी रिपोर्ट छपी, जिसने सबको झकझोर कर रख दिया। उस खबर का शीर्षक था:
‘भुवनेश्वर…नेहरू-गांधी परिवार के लिए एक मनहूस शहर’
इस तरह ओडिशा की यह पावन धरती इस राजनीतिक परिवार के लिए हमेशा-हमेशा के लिए एक दुःस्वप्न और त्रासदी की प्रतीक बन गई।