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bilaspur high court decision on technical lapses in ndps cases
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने गांजा तस्करी के एक गंभीर मामले में महत्वपूर्ण स्पष्टिकरण देते हुए कहा है कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 52-ए में हुई मामूली तकनीकी चूक हमेशा अभियोजन के लिए नुकसानदेह नहीं होती।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने यह निर्णय सुनाया कि यदि आरोपी के कब्जे और नशीले पदार्थ की बरामदगी साबित हो जाती है, तो केवल प्रक्रियात्मक देरी या तकनीकी कमी के आधार पर सजा रद्द नहीं की जा सकती।
एनडीपीएस एक्ट की धारा 52-ए का मुख्य उद्देश्य नशीले पदार्थों के निपटान की प्रक्रिया को सुरक्षित करना, उनकी सूची तैयार करना और मजिस्ट्रेट से प्रमाणित नमूनों को प्राथमिक साक्ष्य के रूप में सुरक्षित रखना है। यह प्रावधान इसलिए बनाया गया है ताकि लंबी सुनवाई के दौरान माल के खराब होने या चोरी होने की स्थिति में भी दोषसिद्धि संभव हो सके।
उच्च न्यायालय ने गांजा तस्करी के दो आरोपियों की अपील को खारिज कर दिया। मामले की जांच डीआरआई (Directorate of Revenue Intelligence) टीम ने 11 नवंबर 2020 को गुप्त सूचना के आधार पर की थी कि एक ट्रक में भारी मात्रा में गांजा ओडिशा से प्रयागराज ले जाया जा रहा है।
जांच के दौरान अभनपुर-रायपुर हाईवे पर ट्रक (क्रमांक: CG 08 L 3166) को रोका गया। ड्राइवर के बगल वाली सीट के पीछे एक गुप्त चैम्बर मिला, जिसे प्लाईवुड से छिपाया गया था। इसे खोलने पर 155 पैकेट गांजा, कुल 697 किलो बरामद हुए।
हाई कोर्ट ने इस पर स्पष्ट किया कि अभियोजन में तकनीकी चूक केवल तभी विचाराधीन हो सकती है जब इससे दोषसिद्धि पर वास्तविक असर पड़ता हो, अन्यथा नशीले पदार्थ की बरामदगी पर्याप्त साक्ष्य है।