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रायपुर। छत्तीसगढ़ में भारतमाला प्रोजेक्ट के तहत इकोनॉमिक कॉरिडोर के निर्माण में एक बड़ा जमीन घोटाला सामने आया है। सरकारी अफसरों, रसूखदार जमीन मालिकों और भू-माफियाओं की सांठगांठ से जमीनों को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर 100 करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त मुआवजा डकार लिया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस "घोटाले" में किसी के ठगे जाने के बजाय, मिलीभगत करने वाले सभी पक्ष मालामाल हो गए हैं।
जांच रिपोर्ट और पड़ताल में खुलासा हुआ है कि अभनपुर और कुरुद ब्लॉक के कई गांवों में खसरा नंबरों को जानबूझकर कई हिस्सों में बांटा गया। हाल ही में जांच के दायरे में आए लोगों ने अपने रिश्तेदारों, बेटा-बहुओं और करीबियों के नाम पर जमीनें दिखाकर करोड़ों का मुआवजा हासिल किया।
बनारसी लाल अग्रवाल ने बेटे और बहुओं के नाम पर 34 खसरों से 22.81 करोड़ रुपये लिए।
जेपी पांडेय ने खुद और 'नेक्स्ट जेने' के नाम पर 15 खसरों से 10.13 करोड़ रुपये का मुआवजा मिला।
छोटूराम को बेटों के नाम पर 13 खसरों से 10.07 करोड़ रुपये डकारे।
सत्यनारायण गांधी व गोपालचंद गांधी ने 11 खसरों से 8.08 करोड़ रुपये का लाभ लिया।
सूबेलाल ने बेटे-बेटियों के नाम पर 8 खसरों से 6.41 करोड़ रुपये का मुआवजा उठाया।
यह पूरा फर्जीवाड़ा अभनपुर और कुरुद क्षेत्र के गांवों में केंद्रित रहा। मुख्य रूप से नायकबांधा, सातपारा, उरला, मुड़पार (भेलवाडीह), टोकरो, तर्रा, कोलर, सारखी और नांदगांव इलाकों में खसरों के टुकड़े कर बंदरबांट की गई है।
हैरानी की बात यह है कि प्रोजेक्ट की भनक लगते ही बाहरी व्यापारियों ने इन गांवों में डेरा डाल दिया था। आनन-फानन में जमीनें खरीदी गईं और प्रशासनिक अधिकारियों से सांठगांठ कर उन्हें रिकॉर्ड में इस तरह दर्ज कराया गया जिससे मुआवजा कई गुना बढ़ जाए। इस कॉरिडोर में मुआवजा पाने वालों में असली किसानों से ज्यादा बाहरी व्यापारियों और रसूखदारों की संख्या है। अभनपुर के एक कद्दावर नेता का नाम भी इस करोड़ों के खेल में सामने आ रहा है।
बिना राजस्व अधिकारियों (पटवारी, तहसीलदार) की मदद के खसरों का इस तरह विभाजन और मुआवजे का भुगतान संभव नहीं था। अब जांच इस बिंदु पर टिकी है कि आखिर किन अफसरों के संरक्षण में सरकारी खजाने को यह बड़ी चपत लगाई गई।