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रायपुर। छत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड तक नक्सल प्रभावित इलाकों की तस्वीर अब तेजी से बदल रही है। लंबे समय तक दहशत और हिंसा के लिए कुख्यात रहे इन क्षेत्रों में अब नक्सली संगठन अंतिम दौर में नजर आ रहे हैं। सक्रिय नक्सली या तो आत्मसमर्पण कर रहे हैं या फिर सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ों में मारे जा रहे हैं, जिससे हालात में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।
रायपुर से रांची तक जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर पहले जहां शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता था, वहीं अब देर रात तक ढाबों, होटलों और पेट्रोल पंपों पर लोगों की आवाजाही बनी रहती है। कभी लूटपाट और हमलों के लिए बदनाम रहे इस मार्ग पर पिछले तीन महीनों में अपराधों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
सीमावर्ती इलाकों में भी बदलाव साफ नजर आ रहा है। जशपुर से गुमला तक का क्षेत्र, जो पहले सबसे संवेदनशील माना जाता था, अब अपेक्षाकृत सुरक्षित हो गया है। लोहरदगा और बोकारो जैसे औद्योगिक इलाकों में भी हालात में सुधार हुआ है। भारतमाला परियोजना और सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई के चलते इन क्षेत्रों में नए ढाबे, होटल और छोटे व्यवसाय शुरू हो रहे हैं, जिससे स्थानीय रोजगार को भी बढ़ावा मिल रहा है।
इसी बीच बस्तर क्षेत्र से एक बड़ा घटनाक्रम सामने आ रहा है। कुख्यात नक्सली कमांडर पापाराव के आत्मसमर्पण की खबरें सामने आई हैं। सुकमा का रहने वाला पापाराव पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी का अहम सदस्य रहा है और कई बड़ी नक्सली घटनाओं में उसकी भूमिका रही है। सूत्रों के अनुसार, वह अपने साथियों और हथियारों के साथ सुरक्षा बलों के समक्ष सरेंडर की तैयारी में है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।
जानकारों का मानना है कि पापाराव का आत्मसमर्पण नक्सल आंदोलन के लिए बड़ा झटका साबित होगा। हाल के वर्षों में कई बड़े नक्सली या तो मारे जा चुके हैं या मुख्यधारा में लौट चुके हैं। अब केवल कुछ ही हार्डकोर नक्सली बचे हैं, जिनमें मिशिर बेसरा और असीम मंडल जैसे नाम शामिल हैं।
हालांकि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद लगभग समाप्ति की ओर है, लेकिन झारखंड के कुछ इलाकों में अब भी चुनौती बनी हुई है। खासकर सारंडा वन क्षेत्र में सुरक्षा बलों द्वारा अंतिम अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें सीआरपीएफ, कोबरा और राज्य पुलिस संयुक्त रूप से कार्रवाई कर रहे हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश से नक्सलवाद खत्म करने के लिए 31 मार्च 2026 की समयसीमा तय की है। हालांकि, झारखंड में सक्रिय बचे हुए नक्सलियों को देखते हुए इस डेडलाइन को आगे बढ़ाने की संभावना भी जताई जा रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि हालात में काफी सुधार हुआ है, लेकिन कुछ अंदरूनी इलाकों में अब भी नक्सली सक्रिय हैं। उनका मानना है कि समस्या के स्थायी समाधान के लिए केवल सैन्य कार्रवाई ही नहीं, बल्कि विकास और संवाद भी जरूरी है।