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नई दिल्ली। लंदन की क्वीन मेरी यूनिवर्सिटी में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने न्याय व्यवस्था को लेकर बेहद भावुक और मार्मिक विचार साझा किए हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जो अदालत सिर्फ उन लोगों के हक की रक्षा करती है जो मुकदमा लड़ने का भारी खर्च उठा सकते हैं, तो वह अपने संवैधानिक दायित्वों को पूरा नहीं कर रही है, बल्कि सिर्फ खानापूर्ति कर रही है। न्याय की गूंज कागजों से निकलकर आम आदमी की जिंदगी में असलियत बनकर दिखनी चाहिए।
CJI सूर्यकांत ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि लोकतंत्र में न्यायपालिका अंतिम उम्मीद होती है, इसलिए जनता का भरोसा बनाए रखना सबसे जरूरी है। उन्होंने कहा, “न्याय सिर्फ यांत्रिक नियमों को लागू करना नहीं है, बल्कि इंसानी वास्तविकताओं को समझते हुए कानून का सही संतुलन बनाना है।”
न्याय की प्रक्रिया को सस्ती, पारदर्शी और सुलभ बनाने के लिए अदालत में तकनीक को इस तरह शामिल किया जाना चाहिए जिससे आम आदमी को राहत मिले। आज भारतीय न्यायपालिका के सामने मुकदमों के भारी बोझ और त्वरित न्याय के बीच संतुलन बनाने की बड़ी चुनौती है।
लंदन के कार्यक्रम में हंगामा, भारतीय दूतावास सख्त
CJI सूर्यकांत के इस छह दिवसीय ब्रिटेन दौरे के दौरान एक विवाद भी सामने आया। यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अंतर्राष्ट्रीय कानून' विषय पर आयोजित व्याख्यान के दौरान कुछ लोगों ने असहज स्थिति पैदा करने और व्यवधान डालने की कोशिश की।
इस हंगामे पर भारतीय दूतावास ने सख्त रुख अपनाते हुए कड़ी आपत्ति जताई है। भारतीय उच्चायोग ने इस अमर्यादित व्यवहार की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे सार्वजनिक संवाद के सिद्धांतों के खिलाफ बताया है।
न्यायपालिका की जवाबदेही और जनविश्वास
CJI ने स्पष्ट किया कि अदालतों की ताकत उनके अचूक दिखने में नहीं, बल्कि अपनी गलतियों को सुधारने और लगातार सीखने की क्षमता में है। जनता का भरोसा किसी संस्था को मुफ्त में नहीं मिलता, बल्कि इसे पारदर्शिता, निरंतरता और खुद में सुधार करने के साहस से कमाना पड़ता है। इसके साथ ही उन्होंने देश में एक 'समान राष्ट्रीय न्यायिक नीति' की वकालत भी की।