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रायपुर: छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी एक बार फिर विवादों के घेरे में है। सर्वहित संघ ने कंपनी प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि वह 'आरक्षित संघ' के अनुचित दबाव में आकर माननीय न्यायालय के आदेशों की निरंतर अवमानना कर रही है। संघ का कहना है कि कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद सामान्य और पिछड़ा वर्ग के कर्मचारियों के साथ न्याय नहीं किया जा रहा है।
सर्वहित संघ के अनुसार, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने रिट 409/2013 एवं अन्य 27 याचिकाओं पर वर्ष 2019 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इस आदेश में 'पदोन्नति नियम 2003' के बिंदु-5 (जिसमें आरक्षण के बिंदु निर्धारित थे) को पूरी तरह अपास्त (निरस्त) कर दिया गया था।
अदालत ने स्पष्ट किया था कि अब सभी पदोन्नतियां सुप्रीम कोर्ट के 'एम. नागराज' मामले में दिए गए निर्णय और तथ्यात्मक आंकड़ों के आधार पर ही की जानी चाहिए। बावजूद इसके, विद्युत कंपनी ने पिछले 7 वर्षों से इस निर्णय को ठंडे बस्ते में डाल रखा है और अपनी मनमर्जी से नियम चला रही है।
सर्वहित संघ की विज्ञप्ति में कहा गया है कि आरक्षित संघ संविधान के विरुद्ध 'दबाव की राजनीति' कर रहा है, जिसके आगे झुककर कंपनी प्रबंधन न्यायिक मर्यादाओं का उल्लंघन कर रहा है। संघ का कहना है न्यायालय ने तीन बार पदोन्नति में आरक्षण को अमान्य ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट में लंबित चुनौती में कहीं भी पदोन्नति रोकने या आरक्षण जारी रखने का उल्लेख नहीं है। इसके बावजूद, सामान्य और पिछड़ा वर्ग के हितों के साथ विश्वासघात किया जा रहा है।
आशिष अग्निहोत्री, महासचिव (सर्वहित संघ) ने बताया “आरक्षित संघ द्वारा वर्ष 2004 के बाद किए गए सभी प्रमोशन संवैधानिक रूप से अमान्य हैं। इन्हें पदावनत (Demote) करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं है, लेकिन भ्रम फैलाकर मामले को लटकाया जा रहा है।”
उल्लेखनीय है कि न्यायालय के निर्णय के बाद कंपनी ने एक परिपत्र (Circular) जारी कर प्रक्रिया तो निर्धारित की थी, लेकिन उसका क्रियान्वयन पिछले 7 सालों से अटका हुआ है। सर्वहित संघ ने कड़ा रुख अपनाते हुए प्रबंधन को चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही न्यायसंगत कार्रवाई नहीं हुई, तो प्रदेश भर के अधिकारी और कर्मचारी उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।