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नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने बच्चों के अधिकारों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मानवीय दृष्टिकोण वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि एक बच्चे का अपने जैविक माता-पिता की पहचान जानने का अधिकार, किसी भी वयस्क व्यक्ति की प्रतिष्ठा या सामाजिक कलंक के डर से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
क्या है मामला?
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने एक परिवार अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें एक व्यक्ति और तीन बच्चों का DNA टेस्ट कराने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य केवल दो पक्षों के बीच के विवाद को सुलझाना ही नहीं, बल्कि बच्चे के सर्वोत्तम हितों की रक्षा करना भी है।
यह फैसला उन कानूनी मामलों में एक नजीर (Precedent) की तरह काम करेगा जहाँ बच्चों के मूल अधिकार और पहचान का मुद्दा प्रमुख होता है।