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how nano urea reduces farming cost
रायपुर। छत्तीसगढ़ के कृषि क्षेत्र में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव तेजी से देखने को मिल रहा है। पारंपरिक रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने और किसानों की जेब का बोझ हल्का करने के लिए अब किसान नैनो यूरिया और नैनो डीएपी (DAP) की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों और कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, नैनो खाद के संतुलित उपयोग से न केवल खेती की लागत में कमी आएगी, बल्कि फसल उत्पादन में भी 5 से 8 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी देखी जा सकती है।
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, लगातार और अत्यधिक मात्रा में रासायनिक खादों के इस्तेमाल से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति (उर्वरकता) बुरी तरह प्रभावित हो रही है। इसके विपरीत, नैनो उर्वरकों का संतुलित उपयोग मिट्टी की जैविक सक्रियता को बेहतर बनाए रखता है। इसका एक बड़ा फायदा यह भी है कि इससे भूजल (Groundwater) प्रदूषण में काफी कमी आती है।
धान की खेती में हर सीजन में सबसे बड़ा खर्च खाद पर ही होता है। खासकर यूरिया और डीएपी की बढ़ती खपत किसानों के बजट को बिगाड़ रही है। वर्तमान स्थिति और खर्च का आकलन कुछ इस तरह है।
छत्तीसगढ़ के अधिकांश धान उत्पादक इलाकों में किसान प्रति एकड़ औसतन 2 से 3 बोरी यूरिया और करीब 1 बोरी डीएपी का उपयोग करते हैं। बाजार में फिलहाल एक बोरी यूरिया की कीमत करीब ₹270 और डीएपी की कीमत लगभग ₹1350 है। इस लिहाज से केवल इन दो खादों पर ही किसानों का प्रति एकड़ खर्च ₹1900 से ₹2200 तक आ जाता है।
नैनो यूरिया की मात्र 500 मिलीलीटर की एक बोतल, पारंपरिक यूरिया की एक पूरी बोरी जितना असर देती है। यदि कोई किसान 2 बोरी पारंपरिक यूरिया की जगह नैनो यूरिया की 2 बोलों का उपयोग करता है, तो उसकी सीधे ₹100 तक की बचत होती है। इसी तरह, 50 किलो पारंपरिक डीएपी की पूरी बोरी डालने के बजाय यदि किसान उसकी आधी मात्रा (25 किलो) करे और साथ में 500 मिलीलीटर नैनो डीएपी का उपयोग करे, तो प्रति एकड़ ₹75 से ₹150 तक खर्च कम हो सकता है। दोनों खादों के इस स्मार्ट कॉम्बिनेशन से किसान खेती की लागत में कुल ₹250 रुपये तक की कमी ला सकते हैं।
कृषि विभाग के मुताबिक, राज्य में फिलहाल पारंपरिक खाद का भी पर्याप्त भंडारण मौजूद है। अकेले रायपुर जिले की बात करें तो अभी 9102 मीट्रिक टन यूरिया और 092 मीट्रिक टन डीएपी उपलब्ध है। इसके साथ ही, किसानों की सहूलियत के लिए सहकारी समितियों और कृषि सेवा केंद्रों पर नैनो यूरिया तथा नैनो डीएपी की उपलब्धता को भी तेजी से बढ़ाया जा रहा है ताकि किसान आसानी से इस नई तकनीक को अपना सकें।