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नई दिल्ली: इंटरनेट मीडिया पर अपनी अनूठी शैली से चर्चाओं में रहने वाले अभिजीत दीपक द्वारा नवगठित 'काकरोच जनता पार्टी' ने राजधानी के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर नीट (NEET) समेत अन्य दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होने के मामले में एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया। इंस्टाग्राम पर सवा दो करोड़ से अधिक फॉलोअर्स का दावा करने वाली इस पार्टी के जमीनी प्रदर्शन में करीब दो हजार लोग जंतर-मंतर पहुंचे। इस दौरान प्रदर्शनकारियों को आइसा (AISA), एसएफआई (SFI) के अलावा आम आदमी पार्टी (AAP) का भी समर्थन मिला।
प्रशासन द्वारा इस प्रदर्शन के लिए सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक की अनुमति दी गई थी, लेकिन तेज गर्मी के कारण समय से पहले यानी करीब सवा तीन बजे ही अभिजीत दीपक समेत उनके साथी मंच से चले गए, जिसके बाद आयोजकों ने प्रदर्शन समाप्त करने की घोषणा की।
जंतर-मंतर पर हुए इस अनूठे प्रदर्शन में शामिल युवा अपने चेहरों पर काकरोच का चित्र छपा हुआ मास्क लगाकर पहुंचे थे। हालांकि, यह प्रदर्शन मूल रूप से नीट परीक्षा के पेपर लीक मामले के खिलाफ आयोजित किया गया था, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि इसमें असली नीट परीक्षार्थियों या कॉलेज छात्रों की संख्या कम थी; इसके विपरीत प्रदर्शन में ज्यादातर नौकरीपेशा युवा शामिल दिखाई दिए।
प्रदर्शन के दौरान अभिजीत दीपके ने विरोध करने की इजाजत देने के लिए सरकार का आभार जताया, लेकिन साथ ही पेपर लीक के मुद्दे पर तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने बेहद भावुक लहजे में कहा कि पेपर लीक होने के कारण हताशा में आकर पांच विद्यार्थियों ने आत्महत्या (सुसाइड) कर ली है। उन्होंने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा “आप इंटरनेट मीडिया से हमारे पोस्ट हटा सकते हैं, लेकिन युवाओं की आवाज को दबा नहीं सकते। पिछले एक महीने से इंटरनेट मीडिया के जरिए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग उठाई जा रही है, लेकिन सरकार मांगों पर ध्यान देने के बजाय हमारे पोस्ट हटाने में व्यस्त है। हमारी लड़ाई लंबी है और हम पीछे हटने वाले नहीं हैं।”
इस विरोध प्रदर्शन में मशहूर शिक्षा सुधारक और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक भी शामिल हुए। उन्होंने मंच से युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि इसे केवल एक प्रदर्शन कहना ठीक नहीं होगा; हमारी मुख्य मांग यह है कि सरकार अपने वादों की जिम्मेदारी ले। वांगचुक ने शिक्षा व्यवस्था पर बल देते हुए कहा कि आज युवाओं ने शिक्षा का मुख्य मुद्दा उठाया है। गांव में चलने वाले स्कूल विकसित भारत का कारखाना हैं, इसलिए इनमें सुधार होना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।