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काठमांडू/नई दिल्ली। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के एक हालिया बयान के बाद नेपाल–भारत सीमा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। संसद में दिए गए अपने कथित बयान में उन्होंने कहा कि काठमांडू और दिल्ली के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद को सुलझाने के लिए कूटनीतिक स्तर पर बातचीत शुरू हो चुकी है और दोनों देश समाधान की दिशा में सहमत हुए हैं।
प्रधानमंत्री शाह के अनुसार, कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों को लेकर उठे विवाद को हल करने के लिए दोनों देशों ने इतिहासकारों, सर्वेक्षकों और विशेषज्ञों की सहायता लेने पर सहमति जताई है। उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर दोनों तरफ से कूटनीतिक नोटों का आदान-प्रदान हो चुका है।
नेपाल और भारत के बीच यह सीमा विवाद वर्षों पुराना है, जिसमें दोनों देश इन क्षेत्रों पर अपना-अपना दावा करते रहे हैं। भारत का पक्ष रहा है कि ये क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा हैं और सभी मुद्दों का समाधान द्विपक्षीय बातचीत के जरिए होना चाहिए।
अपने बयान में बालेन्द्र शाह ने यह भी दावा किया कि केवल नेपाल ही नहीं, बल्कि कुछ स्थानों पर भारत के साथ भी सीमा संबंधी असहमति रही है, जिनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ब्रिटिश भारत काल से जुड़ी हुई है। उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले को समझने के लिए ऐतिहासिक तथ्यों और विशेषज्ञ अध्ययन की जरूरत है।
हालांकि, प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद नेपाल के भीतर राजनीतिक और सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई लोगों ने उनके दावे को विवादास्पद और तथ्यहीन बताया है।
उधर, पूर्व नेपाली राजनयिकों और विशेषज्ञों ने भी इस तरह के दावों पर सवाल उठाए हैं। पूर्व राजदूतों और सीमा विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्रों पर कब्जे के किसी भी दावे का कोई आधिकारिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच अधिकांश सीमा विवाद पहले ही सुलझ चुके हैं और बाकी मुद्दे तकनीकी और सीमांकन से जुड़े हैं।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में पारंपरिक उपयोग को “कब्जा” के रूप में देखना सही नहीं होगा और ऐसे मामलों का समाधान केवल तकनीकी सर्वेक्षण और द्विपक्षीय बातचीत से ही संभव है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर नेपाल–भारत संबंधों और सीमा विवादों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है, हालांकि दोनों देशों की ओर से अब तक इस पर कोई आधिकारिक संयुक्त बयान सामने नहीं आया है।