

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

sabarimala-women-entry-supreme-court-hearing-superstition-ob
नई दिल्ली। Supreme Court of India की 9 सदस्यीय संविधान पीठ ने केरल के Sabarimala Temple सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी याचिकाओं पर बुधवार को भी सुनवाई जारी रखी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, यह तय करने का अधिकार उसके क्षेत्राधिकार में आता है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने दलील दी कि धर्मनिरपेक्ष अदालत को धार्मिक प्रथाओं पर फैसला नहीं करना चाहिए, क्योंकि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं। उन्होंने सवाल उठाया कि अदालत कैसे तय कर सकती है कि कौन सी प्रथा अंधविश्वास है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई प्रथा अंधविश्वास मानी भी जाए, तो उसमें हस्तक्षेप करना अदालत का नहीं, बल्कि विधायिका का काम है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 25(2)(ब) में प्रावधान है।
दिनभर चली सुनवाई के अंत में जस्टिस B. V. Nagarathna ने एक अहम सवाल उठाया। उन्होंने सॉलिसिटर जनरल से पूछा कि सबरीमला मामले में मूल याचिकाकर्ता कौन हैं। इस पर मेहता ने बताया कि याचिका वकीलों के संगठन Indian Young Lawyers Association द्वारा दायर की गई है।
इस पर जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता भक्त नहीं हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या भगवान अयप्पा का कोई वास्तविक भक्त इस परंपरा को चुनौती देने के लिए याचिका दायर कर सकता है। साथ ही यह भी पूछा कि जो व्यक्ति मंदिर से सीधे तौर पर जुड़ा नहीं है, क्या उसकी याचिका पर अदालत को सुनवाई करनी चाहिए।
इस महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई जारी है और इसका फैसला देशभर में धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के अधिकारों के बीच संतुलन तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।