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supreme court tet mandatory teachers deadline extended 2028
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को अनिवार्य बताते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जिन शिक्षकों ने अभी तक TET उत्तीर्ण नहीं किया है, उन्हें हर हाल में 31 अगस्त 2028 तक यह परीक्षा पास करनी होगी। कोर्ट ने साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि इसके बाद किसी प्रकार की अतिरिक्त छूट या समयवृद्धि नहीं दी जाएगी।
यह फैसला देश के 20 लाख से अधिक शिक्षकों को प्रभावित करेगा, विशेष रूप से उन शिक्षकों को जो शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 लागू होने से पहले नियुक्त हुए थे और जिनकी सेवानिवृत्ति में अभी पांच वर्ष से अधिक का समय शेष है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने राज्य सरकारों, शिक्षक संगठनों और व्यक्तिगत शिक्षकों द्वारा दायर 65 से अधिक पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया। इन याचिकाओं में वर्ष 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व आदेश को बरकरार रखते हुए केवल समयसीमा में संशोधन किया है। पहले शिक्षकों को 31 अगस्त 2027 तक TET पास करने का निर्देश दिया गया था, जिसे अब बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दिया गया है।
अदालत ने माना कि TET परीक्षा आयोजित करने में समय, संसाधन और प्रशासनिक तैयारियों की आवश्यकता होती है। इसी कारण शिक्षकों को राहत देते हुए दो वर्ष की अवधि को बढ़ाकर तीन वर्ष कर दिया गया। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अंतिम अवसर है और आगे किसी प्रकार की मोहलत नहीं दी जाएगी।
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राइट ऑफ चिल्ड्रेन टू फ्री एंड कंपल्सरी एजुकेशन (RTE) एक्ट, 2009 की मूल भावना यह सुनिश्चित करना है कि सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिले। इसके लिए शिक्षकों का न्यूनतम योग्यता मानकों को पूरा करना आवश्यक है।
अदालत ने कहा कि कानून में पहले से यह व्यवस्था मौजूद है कि सेवा में कार्यरत शिक्षक भी निर्धारित समय के भीतर आवश्यक शैक्षणिक योग्यताएं प्राप्त करें। इससे स्पष्ट है कि संसद की मंशा सभी शिक्षकों के लिए समान न्यूनतम मानक सुनिश्चित करना था।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (NCTE) द्वारा जारी अधिसूचनाएं या अधीनस्थ नियम मूल कानून से ऊपर नहीं हो सकते। इसलिए किसी प्रशासनिक छूट या अधिसूचना के आधार पर TET की अनिवार्यता को समाप्त नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि 2011 के संशोधन से पहले नियुक्त शिक्षकों को सेवा के बीच में TET पास करने के लिए बाध्य करना अनुचित है और इससे उनकी सेवा शर्तों में बदलाव होगा। उन्होंने यह भी कहा कि बड़ी संख्या में शिक्षक नौकरी खो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इन तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि केवल नौकरी जाने की आशंका के आधार पर कानून की मंशा को कमजोर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि बिना TET योग्यता वाले शिक्षक लंबे समय तक सेवा में बने रहते हैं तो इसका सीधा असर आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ेगा।
खंडपीठ ने कहा कि RTE अधिनियम बच्चों को केंद्र में रखकर बनाया गया कानून है और इसकी व्याख्या भी बच्चों के सर्वोत्तम हितों को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, “शिक्षकों की नौकरी बच्चों के शैक्षणिक भविष्य की कीमत पर नहीं चल सकती।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि TET का उद्देश्य केवल परीक्षा लेना नहीं, बल्कि प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना और योग्य शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों और संबंधित शिक्षा विभागों को निर्देश दिया है कि TET परीक्षाओं का नियमित आयोजन सुनिश्चित किया जाए। अदालत ने कहा कि परीक्षा साल में कम से कम दो बार और लगभग छह महीने के अंतराल पर आयोजित की जानी चाहिए, ताकि शिक्षकों को पर्याप्त अवसर मिल सकें।
इस फैसले के बाद देशभर के लाखों शिक्षकों को निर्धारित समयसीमा के भीतर TET पास करना अनिवार्य होगा। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे स्कूलों में शिक्षण गुणवत्ता में सुधार आएगा और राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षकों के लिए समान योग्यता मानक लागू होंगे।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही सभी पुनर्विचार याचिकाएं खारिज हो गई हैं और अब 31 अगस्त 2028 की समयसीमा अंतिम मानी जाएगी।